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होरहा / कुमार वीरेन्द्र

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हो रहा होरहा[1] हो रहा
होरहा हो रहा - हो रहा, हो रहा होरहा हो रहा - हो रहा
लाठी-खोरनाठी ऊपर बूँट-मटर की डाँठ, तर लहक रही लह-लह, आम-महुआ की पतई
बह रही सन-सन पन-पन पछुआ बयार, उठ रहा धुआँ, घूम छू रहा छोरे-छोर बधार, और
झोरा रहा - झोरा रहा, लहर लूटते लहर यह होरहा, झर-झर चू रहे - चू रहे, बूँट-मटर
की ढेंढ़ी-छेमी, आहा-आहा कर चहक रहीं, बहक रहीं, महक रहीं
बेटू-छितू मोर बिटिया, मोर हिया, मोर चिरईं, मन
भी मुस्कुरा रहा, भूख भी चमक रही
मुख भी दमक रहा

आग की दवँक में आँख-भर ही सही, दुःख भी झुलस, लहक रहा

यह बधार में कैसा आहार
रोम-रोम फरफरा रहा, अँखियाँ रहीं निहार, 'आहा-आहा पापा
पापा, ओह-ओह, कित्ता अच्छा, अच्छा-अच्छा…', चह-चह चहकते, करते मह-मह, दौड़-दौड़ ला रहीं, झोंक
रहीं पतई, और पापा रे पापा, झोर रहा, होरहा रे होरहा, होरहा हो रहा, ओ होरहा, हो रहा, 'अहा ओह-ओह
आहा, खाओ-खाओ लो-लो, खाओ-खाओ लो…', 'अरे अभी नहीं, नहीं भाई, अबहीं तो तनिक
धीरज रखो धीरज', बूझ गईं-बूझ गईं चिरइयाँ, पापा की कान्ह से ले गमछी, एक तो
बह रही पछुआ, ऊपर से हाँक रहीं ऐसे, गमछी अपन तईं, जैसे
तेज़ दे सकत हवा, तभी तो थोर-बहुत हवा में, हवा
का बढ़ रहा ज़ोर, पकड़े पोर

और चिरइँयों की देखो, सुनो समूचे बधार में शोर, पकड़े छोर

ओसा रहा पापा, भर अँजुरी
अँजुरी भर-भर, रोके मुँह में पानी, झोरा चुका जो होरहा, हो चुका जो
होरहा, होरहा हो रहा होरहा, उठ रहे धूल-गर्द, उड़ रहे खर-पतवार दिशा-दिशा, चिरइयाँ आख़िर मारें कित्ता
मारें मन, रखें धीरज हो, संसार; हो गया साफ़-सुथरा, हो गया जब होरहा, बुहारने लगीं अरहर की झाँखी से
भुइँया, पापा अँजुरी-अँजुरी निकाल, रख रहा बित्ते-बित्ते पर होरहा, अब उठ खड़ा हुआ पापा
ली गहरी-पे-गहरी साँस, की देह सोझ, देखते-देखते चिरइयाँ जुट गईं, नमक की
खोल पुड़िया, खाने होरहा, पापा तब तक ताक रहा, कगार से
नदी-किनार का खेत, कि बूँट-मटर चोर कहीं
छुपे-बैठे तो नहीं झाड़ में, आड़ में

का पता कि इधर खाएँ हम, मज़े में ललच-ललक, होरहा

और उधर चोर का, मज़े में अपना
काम हो रहा, फिर रखवारी का, अउर खाना का फिर मजे़ में होरहा
बूझ रहीं सब बूझ रहीं, मोर चिरईं-मोर अँखपुतरी, खाते-खाते होरहा बीच में ही झटपट-चटपट उठ, पहुँच
कगार पे दौड़े-दौड़े जातीं, उछल-छउँक देखने खेत, चिरईं तो चिरईं, हो न हो चोर, लगा ही देतीं, ज़ोर-शोर
से हाँक, 'हे-हेऽऽऽ धरऽऽऽ धरऽऽऽ भागऽऽऽ होऽऽऽ…', और बैठ जातीं दौड़े-दौडे़ आ फिर
खाने संग पापा के, खाने होरहा, फिर क्या, उनकी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की
मुस्की-मुस्कान तैर-तैर जाती यहाँ-वहाँ, सारे जहाँ, अरे आ हा रे
रे होरहा, लो चिरइयों की मुस्की-मुस्कान लिए
आती-जाती खेत-बधार पछुआ

पछुआ सढ़ुआइन भी, भाई; अजब लस्सदार सढ़ुआइन

आती कगरी, लटपटाती कगरी
आँख मार निकल जाती सगरी, 'जा हे सढ़ुआइन, खा रहा होरहा, और
सँग बैठीं चिरइयाँ, नाहीं तो बताता फगुआ में, सब आँख मारना, निकल जाना कगरी से, कि ई तो हद हो गई
हद हो भाई, दुहाई हो दुहाई, कि पाहुन बधार में, और सढ़ुआइन निकल जाए, आँख मार के, जियरा में उठाके
हिलोर, मन बौराहा को और बौराहा बना के, 'पापा-पापा, अरे कहाँ खो-हेरा गए पापा, इधर ताको
पापा, इधर…', 'अरे कहीं नहीं, कहीं नहीं भाई, खाओ-खाओ होरहा, अघाओ…'
छुड़ा-छुड़ा दाने दे रहा पापा, खा रहीं चिरइँया भर-भर मुँह
और ई देखो चिरइँयों के पापा के मन की लहर
लहर की डगर, खाते-खाते होरहा

पछुआ सढ़ुआइन ने आँख का मारी आँख, फगुनहटी बयार में

रँग में बाग़-बाग़ हो गए भाई पाहुन
'धरे भर-भर अँकवार भगतिनिया हो रामाऽऽऽ चइते मासेऽऽऽ, अरे
चइते मासे हो रामाऽऽऽ चइते मासेऽऽऽ हो चइते मासेऽऽऽ; ओढ़ाके चुनरिया बनावे नचनिया हो, रामाऽऽऽ
चइते मासेऽऽऽ...', 'वाह पापा-वाह पापा, वाह-वाह-आहा-आहा, लो अब हमरे हाथ खाओ, आप खाओ पापा
होरहा, होरहा…', और पापा रे पापा, मारा फाँका रे फाँका कि आहा-अहा, और अब देखो, चुक्कड़
दुनिया-भर के चुक्कड़ कि हम नाहीं भुक्खड़, कि इहाँ तो अच्छा-सच्चा आपन
खेत-बधार और साथ चिरइयों का, ऊपर से सढु़आइन पछुआ की
लाग-लपेट, और यह रँगबाज़ी कि मन गया सहँक
गया बहक, खाते-खिलाते होरहा

उधर डूब रहा सूरुज, नदी की लहरों में जा रहा डूबता

देख रहीं चिरइँयाँ बडे़ ग़ौर से
देख-देख हो रहीं लाल, बजा रहीं ताली, ऊपर पेड़ पर कोयल पिहुँक
रही, इधर अपनी याद भी चिहुँक रही, अब ई किससे का कह रही, तो भाई हमसे कह रही हमसे, 'का ए पाहुन
सब तुम ही खा जाओगे, दीदी का खाएगी, भूल गए, कहा था लाने को, होरहा', 'ओ हो, साँचो हम तो बिसर ही
गए, ओ हो रानी...चलो बेटू-छितू चिरईं, अपनी मम्मी को बाँध लो गमछी में, होरहा…', और चिरइँयाँ
रख रहीं भर-भर अँजुरी, चुन फुटहा भी एक-एक दाना, बाँध रहीं बना झोरी, कान्धे
लटका ले जाने, मम्मी की आस पुराने को, ऐसा है जी होरहा, अपना
होरहा जी होरहा, कि इतने में कगार पे जा देखा
दिखा सुखारी उखाड़ते बूँट

देखते मार गया काठ, कहीं मारूँ न लाठी-लात

पर 'जा सुखारी जा, घर जा
साँझ करिया रही, रे बेटा', कहता का इससे ज़ादा, और कैसे, 'बेटा
सुखारी, बूँट की खेती बिला रही, अब गाँव से, रे बेटा, देख कोई-कोई तो बोता पाँच-दस कट्ठा, वह भी बिन
आस, ऐसे में कोई एक थान भी उखाड़े, करेज निकलता, रे बेटा', पर सुखारी कोई बिलायत का थोड़े, गाँव
देश के महाजनो, अपनी ओरी-भीरी है घर, लगता है भतीजा, कल ही कहा था इसकी माई ने
'मचल रहा जी खाने को होरहा...', आजकल पेट से जो है, सुखारी की माई, अपनी
भौजाई, ओ भाई, तो 'ले बेटा सुखारी, दो-चार थान और ले
भर ले दोनों मुट्ठी, और जा, झोर-झोर खिला
होरहा, हमरी भौजाई को

कि पेट काट बचाने से जो बचता, वह कुअन्न

कि भरपेट खाने से जो बचता, वही अपना अन्न !'

शब्दार्थ
  1. चना