भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अंग दर्पण / भाग 14 / रसलीन

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:13, 22 जुलाई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रसलीन |अनुवादक= |संग्रह=अंग दर्पण /...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

नाभी अंतर-वर्णन

मधुप मनोरथ नाभि तर निकट जात थहराय।
याते चंपकली भली अली हिये ठहराय॥146॥

नीबी-वर्णन

सोहत नीबी नाभि पर उपमा कहै न कौन।
मनो अतनु सिर पुहुप धरि बैठै अपने भौंन॥147॥

निरखत नीबी पीत को पल न रहते हैं चैन।
नाभी सरसिज कोस के भौंर भए हैं नैन॥148॥

उदर किंकिंणी वर्णन

उदर सुधा सर चंद पैं लसत कमल की भाँति।
ता पीछे किंकिनि परी कनक भँवर की पाँति॥149॥

पीठ-वर्णन

इक तरू दुइ दल होत हैं यह अचिरज की बात।
दुइ तरु कदली जंघ में पीठ एक ही पात॥150॥

जोरि रूप सुबरन रची विधि रुचि पचि तुव पीठ।
कीन्हीं रखवारी तहाँ व्याली बेनी दीठ॥151॥

पीठ-पनारी-वर्णन

नहीं पनारी पीठ तुब कीन्हें दीठ बिचार।
धसकि गई यह भार ते बेनी के सुकुमार॥152॥

कटि-वर्णन

सुनियन कटि सूच्छम निपट निकट न देखत नैन।
देह भए यों जानिये ज्यो रसना में बैन॥153॥
सूच्छम कटि वा बाल की कहौं कवन परकार।
जाके ओर चितौत ही परत दृगन में बार॥154॥

कटि-बर्णन

सत्य सीलता हरि करी, जगत आपने रंग।
रमनि लंक गढ़ बंक गहि रावन भयों अनंग॥155॥