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अंततः / शलभ श्रीराम सिंह

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अपने ही हाथों
मारा जाता है योद्धा

अपनी ही क़टार
पिस्तौल या बन्दूक से
करनी होती है उसको आत्महत्या

मृत्यु
इसी रूप में आती है उसके पास
बिना बोले
बताए बिना चुपचाप धीरे-धीरे


रचनाकाल : 1993, जौनपुर

शलभ श्रीराम सिंह की यह रचना उनकी निजी डायरी से कविता कोश को चित्रकार और हिन्दी के कवि कुँअर रवीन्द्र के सहयोग से प्राप्त हुई। शलभ जी मृत्यु से पहले अपनी डायरियाँ और रचनाएँ उन्हें सौंप गए थे।

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