भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अजनबी ख़त-ओ-ख़ाल / सूफ़ी तबस्सुम

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:38, 26 नवम्बर 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सूफ़ी तबस्सुम |संग्रह= }} {{KKCatNazm}}‎ <poem> ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ये किस ने मिरी नज़र को लूटा
हर चीज़ का हुस्न छिन गया है
हर शय के हैं अजनबी ख़त-ओ-ख़ाल
बढ़ते चले जा रहे हैं हर सम्त
मौहूम सी बे-रूख़ी के साए
कुछ इस तरह हो रहा है महसूस
जैसे किसी शय का नक़्श-ए-मानूस
आ आ के क़रीब लौट जाए

बेगाना हूँ अपने आप से मैं
और तू भी है दूर दूर मुझ से
कुछ ऐसे बिखर बिखर गए
जल्वों के समेटने को गोया
आँखों में सकत नहीं रही है
क्या तू ने कोई नक़ाब उल्टा
या आज कोई तिलिस्म टूटा !
ये किस ने मिरी नज़र का लूटा
हर शय के हैं अजनबी ख़त-ओ-ख़ाल