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अज अव्यय अखिलेश प्रभु / हनुमानप्रसाद पोद्दार

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(राग ईमन-तीन ताल)

अज अव्यय अखिलेश प्रभु नित्य अचिन्त्यस्वरूप।
 परम-स्वतन्त्र हु‌ए प्रकट चिन्मय रूप अनूप॥
 व्रजमें लीला ललित कर, हु‌ए द्वारकाधीश।
 पार्थ-सखा सारथि बने भक्तञ्वश्य जगदीश॥
 वरदहस्त हो कर रहे अक्षय अभय प्रदान।
 शरणागत-वत्सल सहज सुहृद कृष्ण भगवान॥