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अधेड़ हो आयी है गोले / भारतेन्दु मिश्र

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वह झूलती है बूढ़े पिता के पैरों पर
जैसे दुधमुंहें झूलते हैं लोरी की धुन पर
और वे सुनाते हैं लोरी
खंतमतइया कौड़ीपइया
खुश होती गोले
बहुत खुश होती है
पचास साल से यूँ ही झूलती आयी है वह
पिता के थक जाने के बाद
खीझने के बावजूद

माँ नहीं है अब इस दुनिया में
पिता जानते हैं उसे शौच कराने की विधि
पहनाते हैं कपड़े
कराते हैं दातून
खिलाते हैं खाना
यूँ तौ और भी सदस्य हैं घर में
जिनसे संभलती नहीं है वह
कुछ कर भी नहीं पाती अपने आप
सिवा ‘मिम मिम’ चीखने के

पिता जानते हैं उसके
‘मिम मिम’ का निहितार्थ
उसकी हँसी
उसका क्रोध्
उसकी क्षमता
बस पिता ही जानते हैं
गोले होती है नाराज
तो चीखती है जोर लगाकर
पीटती है अपने घर के दरवाजे
टूट जाने तक
फाड़ डालती है रंगीन पत्रिकाएँ
अच्छी तस्वीर से खेलने के लिए
पिता जो उसे संभालते हैं
उन्हें नोच ही डालती है नाखूनों से
लहूलुहान होने से बचने के लिए
पिता काटते रहते हैं उसके नाखून
अपनी रक्षा के लिए

अब पिता ही सहते हैं
माँ के हिस्से की भी पीड़ा
कोसते हैं अपने भाग्य को
पर विमुख नहीं हो पाते उसकी सेवा से
रचते हैं दिन रात
निराशा के छंद
चुप्पियों की पेंजनी सी बजती है गोले
पंखकटी मेहराब सी चढ़ बैठती है गोले
पिता के सीने पर
वो अपने बुढ़ापे से नहीं
गोले के भविष्य से निराश हैं
जब कभी उजली हँसी दमकती है
उसके मुख पर
वे आशा के गीत रचते हैं
मानो वही है उनकी जीवंत प्रेरणा
साँझ हो रही है पिता की
और अधेड़ हो आयी है गोले