भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

"अपनी पलकों पर किसी शाम सजा लो मुझको / 'हफ़ीज़' बनारसी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार='हफ़ीज़' बनारसी |अनुवादक= |संग्रह= }}...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

23:53, 29 नवम्बर 2019 के समय का अवतरण

अपनी पलकों पर किसी शाम सजा लो मुझको
मैं अगर रूठ गया हूँ तो मना लो मुझको

सोच के गहरे समंदर से निकालो मुझको
दम घुटा जाए है अब कोई बचा लो मुझको

मैं अगर फूल नहीं हूँ तो शरारा भी नहीं
अपने दामन में बिला खौफ छुपा लो मुझको

अब तो ले दे के तुम्हीं एक सहारा हो मेरा
छोड़ के जाओ न यादों के उजालो मुझको

लब पर आया जो कोई हर्फ़े-गिला तो कहना
शमा की तरह सरे-बज़्म जला लो मुझको

कल यही वक़्त कहीं मेरा तलबगार न हो
अहदे-हाज़िर की अमानत हूँ संभालो मुझको

आऊँ नीचे तो सलामत न रहे मेरा वजूद
इतना ऊँचा न मेरे यारो उछालो मुझको

शिकवा-ए–दर्द ही करते रहे हम लोग 'हफ़ीज़'
दर्द कहता रहा संगीत में ढालो मुझको