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अप्प दीपो भव / नन्द 4 / कुमार रवींद्र

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नन्द करें भी तो क्या
         सोच रहे वे यही विकल से

तीन दिनों से
कपिलवस्तु हैं भाई आये
उनका नया रूप अद्भुत है
सब हैं बौराये

कहती है सुन्दरी -
उन्होंने मोहा सबको ही है छल से

मिलने नहीं गये वे उनसे
हुए भ्रमित हैं
होना है अभिषेक आज ही
नन्द थकित हैं

क्या साधू का योग
बड़ा है सिंहासन के विक्रम-बल से

और सुन्दरी ,,,
उसकी सांसें जीवनधर हैं
भाभी यशोधरा अब भी
कितनी सुन्दर हैं

प्रश्न मथ रहे
निकल न पाता काँटा उनके मर्मस्थल से