भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अब मैं कहा करूँ री माई! / स्वामी सनातनदेव

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:53, 2 दिसम्बर 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=स्वामी सनातनदेव |अनुवादक= |संग्रह...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

राग विलासखानी, ताल झूमर 11.7.1974

अब मैं कहा करूँ री माई।
नंद नँदन की मृदु मुसकन ने बरबस मो मन लियो चुराई॥
देखत ही डार्यौ टोना-सो, हौं तन-मनकी सुधि बिसराई।
मन तो गयो स्याम ही के सँग, तनकों बिरह-व्यथा बिलखाई॥1॥
गयो चैन, नित मैन[1] सतावै, रैन नींदने लई विदाई।
असन-वसन[2] न सुहात सखी री! पावस[3] सी नयनन नित छाई॥2॥
जित देखूँ तित व छवि दीखत, दर-दिवार दरपन जनु माई।
कैसे करूँ काम घर-वर के, मन तो लियो स्याम उरझाई॥3॥
स्याम बिना रहि हों क्यों आली! लालन की लाली उर छाई।
लोक जाय परलोक जाय, पै प्रीतम बिनु जीवन का माई॥4॥
प्राननाथ के भये प्रान तो यहमें कहा भई कोताई[4]
कोउ भलै कहो कुलटा पै मैं तो अब अपनी निधि पाई॥5॥

शब्दार्थ
  1. कामदेव, गोपियों के प्रसंग में प्रेम को ही काम कहा जाता है
  2. भोजन-वस्त्र
  3. वर्षा ऋतु
  4. कमी-कसर