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"अमलकान्ति / नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती / देवदीप मुखर्जी" के अवतरणों में अंतर

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10:39, 9 जनवरी 2020 के समय का अवतरण

मेरा दोस्त अमलकान्ति और मैं
एक साथ पढ़ते थे स्कूल में
देर से आता क्लास में वह रोज़ ही,
पढ़ने-लिखने में फिसड्डी
शब्दों के रूप पूछने पर
अवाक् होकर ताकता रहता खिड़की की ओर
यह देख कष्ट होता था हम सबको

हममें से कोई मास्टर, कोई डाक्टर तो कोई वक़ील होना चाहता था ...
अमलकान्ति यह सब नहीं होना चाहता था
वह धूप होना चाहता था ...

वृष्टिस्नात शाम की वह लज्जावती धूप
स्मित हास्य लिए
लिपटी रहती है
जामुन और जामरुल के पत्तों पर

हममें से कोई मास्टर, कोई डाक्टर, कोई वक़ील हुआ
अमलकान्ति पर धूप नहीं हो सका ..
वह अब अन्धेरे एक छापाख़ाने में काम करता है.
कभी कभार आता है मुझसे मिलने
चाय पीता, इधर-उधर की बातें करता, फिर बोल उठता .. "अच्छा, चलता हूं"..
मैं उसे दरवाज़े तक विदा करता..

हममें से जो अब मास्टर है
वह अनायास ही डाक्टर हो सकता था
जो डाक्टर होना चाहता था
वह वक़ील होने पर भी कुछ नुक़सान नहीं होता
जबकि, सभी की इच्छा पूरी हुई, केवल अमलकान्ति को छोड़कर
अमलकान्ति धूप नहीं हो सका ...

वही अमलकान्ति — धूप होने की सोचते-सोचते
सोचते-सोचते
वह एकदिन धूप होना चाहता था ...

मूल बांग्ला से अनुवाद : देवदीप मुखर्जी
 
अब यही कविता मूल बांग्ला में पढ़िए
অমলকান্তি


নীরেন্দ্রনাথ চক্রবর্তী

অমলকান্তি আমার বন্ধু,
ইস্কুলে আমরা একসঙ্গে পড়তাম।
রোজ দেরি করে ক্লাসে আসতো, পড়া পারত না,
শব্দরূপ জিজ্ঞেস করলে
এমন অবাক হয়ে জানলার দিকে তাকিয়ে থাকতো যে,
দেখে ভারী কষ্ট হত আমাদের।

আমরা কেউ মাষ্টার হতে চেয়েছিলাম, কেউ ডাক্তার, কেউ উকিল।
অমলকান্তি সে-সব কিছু হতে চায়নি।
সে রোদ্দুর হতে চেয়েছিল!

ক্ষান্তবর্ষণ কাক-ডাকা বিকেলের সেই লাজুক রোদ্দুর,
জাম আর জামরুলের পাতায়
যা নাকি অল্প-একটু হাসির মতন লেগে থাকে।

আমরা কেউ মাষ্টার হয়েছি, কেউ ডাক্তার, কেউ উকিল।
অমলকান্তি রোদ্দুর হতে পারেনি।
সে এখন অন্ধকার একটা ছাপাখানায় কাজ করে।
মাঝে মধ্যে আমার সঙ্গে দেখা করতে আসে;
চা খায়, এটা-ওটা গল্প করে, তারপর বলে, “উঠি তাহলে।”
আমি ওকে দরজা পর্যন্ত এগিয়ে দিয়ে আসি।

আমাদের মধ্যে যে এখন মাষ্টারি করে,
অনায়াসে সে ডাক্তার হতে পারত,
যে ডাক্তার হতে চেয়েছিল,
উকিল হলে তার এমন কিছু ক্ষতি হত না।
অথচ, সকলেরই ইচ্ছেপূরণ হল, এক অমলকান্তি ছাড়া।
অমলকান্তি রোদ্দুর হতে পারেনি।
সেই অমলকান্তি–রোদ্দুরের কথা ভাবতে-ভাবতে
ভাবতে-ভাবতে
যে একদিন রোদ্দুর হতে চেয়েছিল।