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"आंच / संतोष श्रीवास्तव" के अवतरणों में अंतर

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मौसम गुजरते रहे  
 
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बिरवे में बर्दाश्त की कोंपलें
 
बिरवे में बर्दाश्त की कोंपलें
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पीड़ा के फूल सुलगे
 
पीड़ा के फूल सुलगे
 
रंगों की कांपती खामोशी लिए  
 
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तितलियाँ मंडराईं
  
 
पतझड़ में सब कुछ  
 
पतझड़ में सब कुछ  

03:24, 25 मार्च 2020 के समय का अवतरण

माथे पर देश की मिट्टी का
तिलक कर
तुम चले गए सरहद पर
और मैंने निपट तनहाई में
प्रेम की माटी में
विरह का बिरवा रोप दिया

मौसम गुजरते रहे
बिरवे में बर्दाश्त की कोंपलें
लहलहाईं
पीड़ा के फूल सुलगे
रंगों की कांपती खामोशी लिए
तितलियाँ मंडराईं

पतझड़ में सब कुछ
मिट्टी में समा गया
तुम भी
तुम्हारी स्मृति लिए
मैं भी

अब बिरवा ठूंठ है
और
मेरे शीश पर
शहीद की विधवा का सूरज है
कौन देख रहा है
उस सूरज की आंच से
निरंतर झुलसता मुझे