भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आईना भी अब देख के हैराँ नहीं होते / 'महताब' हैदर नक़वी

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:27, 23 जुलाई 2013 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार='महताब' हैदर नक़वी }} {{KKCatGhazal}} <poem> आईना ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आईना भी अब देख के हैराँ नहीं होते
ये लोग किसी तौर परेशाँ नहीं होते

पलकों के लिये धूप के तुकड़ों की दुआ हो
साये कभी ख़्वाबों के निगहबाँ नहीं होते

हम हुरमत-ए-दामान-ओ-क़बा के नहीं क़ायल
वहशत में मगर चाक गिरेबां नहीं होते

कह दो कि यही आख़िरी हिजरत है हमारी
हर शहर में यूँ साहब-ए-ईमाँ नहीं होते

होते हैं कई काम मोहब्बत में भी ऐसे
मुश्किल जो नहीं हैं मगर आसाँ नहीं होते