भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आकाश में घुलते-घुलते / उदयन वाजपेयी

Kavita Kosh से
Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:43, 10 नवम्बर 2009 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आकाश में घुलते-घुलते
पूरी तरह ग़ायब हो गया
चन्द्रमा
अँधेरे में

खाली मकान में न जाने कब से
मेज़ के पीछे छिपा है एक बच्चा कि
कोई उसे खेल-खेल में ढूँढे

छत पर खड़ी हो वह देखती है
दूर मकान में चमकती एक खिड़की
और सोचती है :

विरह प्रेम का अनन्त है ।