भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आग के फूल / सुभाष मुखोपाध्याय

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:24, 26 अप्रैल 2009 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: सुभाष मुखोपाध्याय  » आग के फूल

 
सिर पर तूफ़ान उठाए हम लोग आ रहे हैं
मैदान के कीचड़ से सने फटे पैर लिए
धारदार पत्थरों पर
आग के फूल लेकर आ रहे हैं हम।

हमारी आँखों में पानी था
आग है अब।

उभरी हड्डियों वाले पंजर
अब
वज्र बनाने के कारख़ाने हैं।

जिनकी संगीनों में चमक रही है बिजली
वे हट जाएँ सामने से
हमारे चौड़े कंधों से टकराकर
दीवारें गिर रही हैं --
हट जाओ।

गाँव ख़ाली करके हम आ रहे हैं
हम ख़ाली हाथ नहीं लौटेंगे।

 
मूल बंगला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी