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इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुये आसमाँ से हम / मजाज़ लखनवी

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इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुये आसमाँ से हम|
हटकर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम|

क्योंकर हुआ है फ़ाश ज़माने पे क्या कहें,
वो राज़-ए-दिल जो कह न सके राज़दाँ से हम|

हम्दम यही है रहगुज़र-ए-यार-ए-ख़ुश्ख़िराम,
गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशाँ से हम|

क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिये,
उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम|

ठुकरा दिये हैं अक़्ल-ओ-ख़िराद के सनम्कदे,
घबरा चुके हैं कशमकश-ए-इम्तेहाँ से हम|

बख़्शी हैं हम को इश्क़ ने वो जुर्रतें 'मज़ाज़',
डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम|