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09:17, 10 अगस्त 2016 के समय का अवतरण

धार[1] पर सूरज चढ़ने से पहले
बकरियों के खुर के निशानों में
खिलेगा ओस का फूल
पीतलिए खाँकर[2] की धुन में
नाचेगी गौरैया,

आहा!
कैसा समय है यह
उदासियों के कोख में जो बच्चे पल रहे हैं
वे बड़े होंगे एक दिन
अपनी कंचों भरी जेबों में समय को ठूँसते हुए
पार करेंगे उम्र
बनेंगे प्रेमी / प्रेमिकाएँ
दिलाएँगे उम्र भर साथ निभाने का विश्वास
एक दूसरे को

पहचानेंगे ख़ामोशी की जुबाँ
उदासियों का मतलब
जेबों से निकालेंगे समय
और कंचों की तरह बिखेर देंगे
इतिहास के पृष्ठों पर

शब्दार्थ
  1. पहाड़ी
  2. पीतल की घण्टी