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इधर भी तबाही उधर भी तबाही / 'हफ़ीज़' बनारसी

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इधर भी तबाही उधर भी तबाही
कहाँ जाएँ आख़िर मुहब्बत के राही

मेरा इश्क़ क्या है तेरी दिलनवाज़ी
तेरा हुस्न क्या है मेरी ख़ुशनिगाही

वही हुस्नवाले, वही नाज़ो-गमज़ा
वही अहले-दिल हैं वही कज्कुलाही

न कोई तर्दुद, न कोई तफ़क्कुर
फ़क़ीरी में हम कर गए बादशाही

तेरी जुस्तजू में कहाँ आ गए हम
न ज़ादा, न मंज़िल, न रहबर, न राही

अभी नामुकम्मल है जश्ने-चिराग़ा
कहीं रौशनी है कहीं है सियाही

हफ़ीज़' उनके लब पर है कुछ और लेकिन
नज़र और कुछ दे रही है गवाही