भारतीय साहित्य के विशालतम ऑनलाइन संग्रहालय से कुछ आंकड़े (...और गिनती जारी है!)
कविता कोश: 57000+ कुल पन्नें; 2,000+ रचनाकार; 25,000+ कविताएँ; 10,000+ ग़ज़लें; 3,000+ गीत/नवगीत; 1,500+ नज़्में | 125,000+ आगंतुक/माह; 20,000,00+ रचना-पठन/माह
गद्य कोश: 7,000+ कुल पन्नें; 500+ रचनाकार; 1,500+ कहानियाँ; 600+ लघुकथाएँ; 100+ उपन्यास; 600+ आलेख; 300+ निबंध; | 20,000+ आगंतुक/माह; 1,000,00+ रचना-पठन/माह
इन्तज़ार / कमल
Kavita Kosh से
|
बड़ी देर से मौसम
एक जैसा है
न यह बहार बनता है
न पतझर
काश! यह मौसम मेरे मन के
मौसम के बराबर हो जाए
एक मुद्दत से माहौल में
बड़ा शोर मचा हुआ है
न यह चुप में बदलता है
और न ही संगीत में
काश! यह सरगम बन जाए
सुरताल में बंध जाए
बरसों से यह
पत्थर का बुत बना हुआ है
काश! यह रब्ब बन जाए
ताकि मैं उसे पूज सकूँ
या फिर जीता-जागता
इन्सान
ताकि मैं उससे बातें कर सकूँ।