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इन्हें माफ़ न करो! / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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जीवन भर
माफ़ करते रहे
जिए न कभी
रोज़ मरते रहे
शठ ही मिले
द्वार से पार तक
वाणी मधुरा
क्रूरतम कर्म थे
कुटिल हँसी
छल-प्रपंच ,घात
सिर्फ़ धर्म थे
सुकरात तक को
पिलाया विष
विष पिलाने वाले
देंगे तर्क भी
सही ठहराएँगे
यदि ये चूके
चुप नहीं बैठेंगे
फिर आएँगे
हलाहल का घूँट
ये पिलाएँगे
कुछ भी अब करो
जीना है तुम्हें
इन्हें माफ़ न करो!
आज न मरो
रिश्ते -नाते सम्बन्ध
मर जाएँगे
श्मशान तक कुछ
साथ जाएँगे
दो दिन बाद
सभी भूल जाएँगे
पोंछ लो नैन
जीना है तुम्हें अभी
अँधेरे मिटा सभी।