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ईमान की ज़मी पे खड़े हो सको अगर / दरवेश भारती

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ईमान की ज़मी पे खड़े हो सको अगर
सौ मुश्किलों में आयेंगी आसानियाँ नज़र

शोले उगलती धूप से पाना हो गर मफ़र
पास आओ मेरे कहता है ये इक घना शजर

किस मस्अले पर हो गयी इतनी तनातनी
महफ़िल में बौखलाया हुआ है बशर, बशर

यकदम तमाम शह्र में हड़कम्प मच गया
आयी कहाँ नज़र वह जो दरकार थी ख़बर

कुछ ज़ायके में ख़ूब तो बडज़ायक़ा हैं कुछ
चखकर तो देखिये ये सियासत के हैं समर

हर काम में त्रिशंकु का रुतबा मिला उसे
करता रहा जो शख़्स हमेशा अगर-मगर

अपने ज़वाल को भी जो कहते रहें उरूज
 'दरवेश' रह्म आये न क्यों उनके हाल पर