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उन्होंने समय सोचा / रघुवंश मणि

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उन्होंने समय सोचा
गोल-गोल
अपनी जगह घूम-घूम
फरमाया समय
वृत्त की तरह गोल है
आता है वापस इसीलिए
प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार

समय के सीधेपन पर
उन्होंने दिया विमर्श
उसके समानान्तर
रीढ़ की हड्डी सीधी की
सरल रेखा-सा सीधा समय
हाय-हाय लौट कर नहीं आता
ऋजु है ससुरा


समय ए डमरू को
नचाया और बजाकर साब
दिखा दिया किए हैं तमाशा
समय तो है रेत घड़ी
होती है उल्ट-पुल्टा और
झरता है समय

बेलन की तरह है समय
गोलाइयों के बीच नाचता
बम्बे के पाइप में सुबह
खुँखवाता है ज़ोर-ज़ोर


शंकु की तरह
समय को किया सिद्ध
महाशय ने ब्लैक बोड पर
और डस्टर से मिटा कर
बोले फुला कर सीना
कि समझ गए होंगे आप
कविता में समय को लिखो
पंचभुज की तरह
षटभुज की तरह तो
नहीं हो सकता समय

कितनी-कितनी तरह से समझाया
गया समय मुझ को
ज्यामिति की आकृतियों में
पर समझ में नहीं आया समय
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