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उलान्या मास ऐगे, खुदेड़ वगत / गढ़वाली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

उलान्या मास ऐगे, खुदेड़ वगत,
बार रितु बौडी ऐन, बार फूल फूली गैन!
औंदौ की मुखड़ी न्याल्दू,
जांदौं की पिल्वाड़ी।
एक दाणी चौलू बोदी, मैं उमली औं,
निरमैतीण छोरी बोदी, मैं मैंत जौं!
भग्यान्यौं का भाग होला,
जौंका पीठी जौंला भाई!
मैत बोलाला, रीत जणाला!
जौं दिशौं ध्याण्यो का गोती होला मैती,
तौ दिशौं ध्याणी मैत जाली देसु!
सरापी जायान माँजी, विधाता का घर!
जनी कनी पुतरी चुली माँ जी,
एक विराली पालदी!
कुत्ता पालदो, पैरो जागा देन्दो।
केक पाली होलू माँ जी,
मैं निरासू सी फूल।

शब्दार्थ