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12:24, 9 नवम्बर 2011 का अवतरण

एक बार फिर वह सोच रही है अपनी जिंदगी के बारे में झुग्गी में बर्तन मांजने से सुबह की शुरूआत करती हुई और टूटी खाट की लटकती रस्स्यिों के झूले में रात को करवट बदलने के बीीच जीवित होने का अहसास दिलाने के लिये क्या कुछ है शेष