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ऐसा नहीं है / असद ज़ैदी

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ऐसा नहीं है कि सारे कुकर्म समाजवादियों ने ही किए हों
अर्धवाम तो वे थे ही राष्ट्रभक्त और सर्वधर्मसमभावक थे ही
उनकी कुछ गाढ़ी दोस्तियाँ मार्क्सवादियों से भी थीं मुसलमानों से भी
और मैकालेपरस्तों से भी कोई ज़ाती रंजिश तो न थी
उन्होंने हमेशा सिद्धान्त की लड़ाई को
सिद्धान्त तक रखा — मर्यादा न तोड़ी…
संघी राज अकेला उन्हीं का लाया हुअा तो नहीं भाई, मोदी संभावना
क्या उन्हीं के चाहने से अाई? पीछे की बात करें तो क्या करते लोहिया और जे० पी०
मामला पतन और गिरावट का नहीं युगीन नियति का है
समाजवाद की बातें हवा हुईं धर्मनिरपेक्षता बचाए नहीं बच रही…
सामाजिक न्याय की शक्तियों का हाल आपने देख ही लिया कि जहाँ
‘ताक़त ही ताक़त है… चीख़ नहीं’ — क्या तो नाम है कवि का जिसने यह कहा?
रही बात कम्युनिस्टों की तो कम्युनिस्टों में भी अब क्या बचा रहा है!
ऐसा नहीं है कि हिन्दुस्तान में हम अाप ही को नज़र आती हो बदतरी
ऐसा भी नहीं है कि हिन्दुस्तान ही में निवास करती हो ये बदतरी।
यह एक चौथाई सदी खड़ी है तीन सदियों के मलबे पर
न मुक्ति की बात रही न मुक्ति-संग्राम की
औद्योगिक हड़ताल कैसी गर्वीले कामगार कहाँ
पूँजी पूँजी न रही, वित्त ही वित्त है अब
किस दुनिया में रहते हो साथी मज़दूर वर्ग अब एक मिथ है
वर्ग भी मिथ है मिथ हमेशा मिथ थी पर जब तक थी अच्छी थी
लाल लाल लहरा लिया जब तक लहरा लिया
कहते हैं सभी विज्ञजन—समाजविज्ञानी, इतिहासज्ञ, मीडिया-विशेषज्ञ
अभियंता, चिकित्सक, खिलाड़ी, और – सच तो यह है – ख़ुद अाप… सिर्फ़ हमीं नहीं।

हमारे ज़माने में विमर्श है अमर्ष भी ख़ूब है किसी का लेकिन पक्ष पता नहीं चलता
कौन कहाँ जाकर मिलता है किसी से, कितनी देर लगा रहता है फ़ोन पर नेट पर
किसकी कितनी ऊर्जा जाती है हिसाब-किताब में
चाल-चलन मापने के ये पैमाने व्यवस्था के काम आते हैं जीविका से इनका क्या रिश्ता
सच्ची मेहनत सच्ची आग सच्चा अनाज सच्चे आँसू ऐसे नहीं अाते
अचानक ख़ून के धब्बों की तरह उभरती हैं ख़ाली जगहें कभी यहाँ कभी वहाँ
जिन्हें भरने दौड़ते हैं वे जन जिनके कंधे पर गमछा बग़ल में बच्चा नहीं
मेट्रो में मिला नए अर्थतंत्र में काम करता उन्नीस साला लड़का कहता है क्या अन्याय सर,
अाप ही बताओ व्यवस्थाएँ कहीं चला करती हैं
अन्याय के बिना!
क्या तुम किसी ग़रीब के बेटे नहीं? सुनकर वह अापा खो देता है
ग़रीब क्यों होने लगे हम अंकल जी, अापने मेरे को कमूनिस्ट समझा है क्या?
ऐसे मूड में है हमारा नौजवान, यही उसका प्रतिरोध है
यों मुकम्मल होती है सादर प्रणाम से शुरू हुई बात।
एक चौथाई सदी खड़ी है तीन सदियों के मलबे पर
प्रतिपक्ष है जहाँ स्त्री नहीं, स्त्री है जहाँ प्रतिपक्ष नहीं, और स्त्री मैं है स्त्री वह नहीं
स्त्री का शोर ही जहाँ स्त्री है ख़ामोशी स्त्री नहीं है संशय मनुष्यता नहीं
पितृसत्ता का विनाश भी अब एक ख़राब-सा जुमला होकर रह गया है
जो विरोध की लाचारी बताता है जिसे सबसे पहले संरक्षण चाहिए और अंत में संरक्षण
अदालत में पेश हो तो पुलिस के साथ, थाने जाना हो तो वकील के हमराह
पीछे ग़ैर भरोसेमन्द-सी एक ओ० बी० वैन।
जो लोग पर्दों पर निगाह गड़ाए रहते हैं यक़ीन मानिए पर्दा भी उन्हीं को देखता है
टेक्स्ट और ओरल तक न रह जाइए जानिए विज़ुअल डिजिटल वर्चुअल
ऐसा तादात्म्य इतिहास में कभी देखा नहीं गया कि यह दैनिक चमत्कार है
हिन्दुस्तान भी बस एक चमत्कार ही है दलालों ने हर चीज़ को खेल में बदल दिया हैं
विडियो गेम से उकताते हैं तो मुसलमानों को मारने के लिए निकल पड़ते हैं
और जो रास्ते में आता है कहते हैं हम आपको देख लेंगे नम्बर अापका भी आएगा जी।
हम बार बार बोल चुके हैं — ज़ोर से कहता है एक दलित विमर्शकार —
हिन्दू मुस्लिम मामला खुली धोखाधड़ी है, साफ़ मिली-भगत है दोनों पक्षों की
ताकि दलितों का पक्ष सामने न आने पाए, थोड़ी बहुत मारकाट से क्या फ़र्क़ पड़ता है
असली लड़ाई दलितों की है, मियाँ लोगों की नहीं।
यह एक चौथाई सदी खड़ी है तीन सदियों के मलबे पर
खुला मैदान है कहीं भी मूत लो, किधर भी निपट अाअो
असल सचाई तो ये है कि
जो उत्तरसत्य पर ईमान लाए, है वही इस ज़मीन का सच्चा नागरिक।