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कख होली मेरी डाँडी व काँठी / उम्मेद सिंह नेगी

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कख होली मेरी डाँडी व काँठी, कख कुरेड़ी सौण की,
रूम झुम बरखा छुम छुम छोया, मैं कू सूझीं छ स्येण की।
हालड़ का बीच छानी होली, भैंसी बियाई सौण की,
दूद तपाला, खीर पकाला, गोंदगी[1] खाला नौंण[2] की।
बल्दू की घांडी, घस्यारियों का गीत आग लगौंदा ज्यू की।
कखड़ी व ग्वदड़ी पाकींगे होली, बग्वाल[3] पड़ली छोरू की,
मुंगरी की लुंग अजूँ नी चाखी खुद लगीं च दादी की।
ध्वीड़ मिर्गू कँ चाँत पियारो, मैं कू प्यारो गढ़वाल छ,
डाँड्यों का दर्शन होई जौन, लालसा या ही मन मा छ।
चिट्ठी न पतरी कै पापी की भी, याद नी होली सुपिना मा,
मुखड़ी देखीक टुकड़ी हौंन्दी प्यार नी होलू कैका दिल मा।

शब्दार्थ
  1. टिक्की
  2. मक्खन
  3. मौज