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करिया बादल / एस. मनोज

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करिया बादल बरखा देत
बरखा बुन्नी पड़तै खेत

खेतमे तखनहि उगतै धान
अपना सभहक माँछ मखान

कृषक मजूर ल भेंटतै काम
नहिये रहतै कियो बेकाम

फसल उपजतै भेंटतै पाय
नबका कपड़ा देतै माय

डबरा पोखरि हेतै पानि
सभे खुछ अछि ई सभ जानि