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कर्ममेव जीवनम् / सत्यनारायण पांडेय

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कर्मं बिना जीवनं कथम्
कर्मं बिना भाग्योऽपि कुतः स्यात्
कर्मं बिना सौख्यं कथम्
अतः कर्मकरनीयमेव जनैः।

कर्मं बिना न भवति किञ्चित्
कर्मं बिना भोजनमपि दुर्लभम्
भोजनं बिना शरीरं कथम्
अतः कर्मकरनीयमेव जनैः।

कर्ममेव निर्माति भाग्यं सदा
शुभफलाकांक्षी शुभकर्मं करोतु मुदा
कर्मं बिना जीवनं कथम्
अतः कर्मकरनीयः सदा।

दुष्कर्माणि दुखदा सदा
अतः त्याज्यं बलपूर्वकम्
सत्कर्मो रक्षति दुख्खात्
सत्कर्मो भवति वंशरक्षकः
कर्मं बिना जीवनं कथम्
अतः कर्माणि करनीयमहर्निशम्।