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कविता लिखने की कला / हावियर हिरॉद / अनिल जनविजय

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सच-सच कहूँ
तो कविता लिखना बेहद मुश्किल काम है
शरतकालों की लय और संगीत ही
यह तय करता है कि हम
कविता लिख पा रहे हैं या नही

जब हम जवान होते हैं
जवानी के उस दौर में
झरते हुए फूल नहीं चुन पाते
लिखते ही रहते हैं रात-रात-भर
और काले कर डालते हैं
हज़ारों कोरे काग़ज़ बेकार ही

हम में से कोई कहता है —
मै तो बस, लिखता ही रहता हूँ
कभी कोई सुधार नहीं करता
कविताएँ उतरती हैं मेरे हाथों से
जैसे उतरा हो वसन्त
सड़क किनारे लगे पलाश के पेड़ों पर

लेकिन धीरे-धीरे
समय गुज़रता चला जाता है
साल बदलते जाते हैं
और हम पहले से बेहतर कविता लिखने लगते हैं

चाक पर किसी कुम्हार के काम की तरह
तेज़ आँच पर पकाए गए मिट्टी के बर्तनों-सी
हमारी कविता भी हो जाती है सलीकेदार
  
यही वह काव्य-दामिनी है
शान्त शब्दों की बौछार
धड़कनों और आशाओं का वन
दमन और प्रताड़ना सहने वालों का गीत
आज़ाद लोगों का नया गीत।

मूल स्पानी से अनुवाद : अनिल जनविजय

लीजिए, अब मूल स्पानी में यह कविता पढ़िए

Arte Poética

En verdad en verdad hablando,
la poesía es un trabajo difícil
que se pierde o se gana
al compás de los años otoñales.
Cuando uno es joven
Y las flores que caen no se recogen
uno escribe y escribe entre las noches,
y a veces se llenan cientos y cientos
de cuartillas inservibles.
Uno puede alardear y decir:
“Yo escribo y no corrijo,
los poemas salen de mi mano
como la primavera que derrumbaron
los viejos cipreses de mis calles”
Pero conforme pasa el tiempo
y los años se filtran entre las sienes,
la poesía se va haciendo
trabajo de alfarero,
arcilla que moldean fuegos rápidos,
y la poesía es un relámpago maravilloso,
una lluvia de palabras silenciosas,
un bosque de latidos y esperanzas,
el canto de los pueblos oprimidos
el nuevo canto de los pueblos liberados.