भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कवियों के कंकाल / कृष्ण कल्पित

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 09:36, 28 मई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=कृष्ण कल्पित |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KK...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं देखना चाहता था कि
शब्दों में कितनी शक्ति बची हुई है

बेचैनी में कितनी बेचैनी
शान्ति में कितनी शान्ति

मैंने देखा प्यार नामक शब्द में
कुछ जलने की गन्ध आ रही थी

झूठ अब उतना झूठा नहीं रहा था
जितने महान थे उतने टुच्चे थे
लुच्चे थे
जितने भी सदाचारी थे

सच्चाई पर अब किसी को यक़ीन नहीं था
धीरज में धैर्य गायब था

पानी अब प्यास नहीं बुझाता था
अग्नि के साथ-साथ चलता था अग्नि-शमन दस्ता

शब्दों के सिर्फ़ खोखल बचे थे
उनका अर्थ सूख गया था

जब भी लिखता था कविता
एक संरचना हाथ आती थी

कवि अब कहाँ थे
हर तरफ़ कवियों के कंकाल थे !