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कहाँ हूँ मैं / प्रतिभा सक्सेना

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कहाँ हूँ मैं !
ढूँढ रही अपने को दुनिया की भीड़ में
उत्सव -हुलास इधर , मस्त-मगन लोग
संभव है यहीं- कहीं सामना हो जाय
लोगों में घूम फिरी
कहाँ -कहाँ ढूँढ फिरी !
नहीं ,यहाँ कहीं नहीं !
नहीं मिली !
पता नहीं कहाँ हूँ  !
खोजूँ कहाँ अपने को ?
हूं भी , कि हूँ ही नहीं  ?


यहीं दूर खड़ा कौन?
होकर असिक्त , निर्लिप्त सभी रंगों से !
चुप्प ,एक दर्शक -सा !
चेहरा बहुत जाना-पहचाना ,
ओह ,मैं ही तो !
यहाँ हूँ , लेकिन उपस्थित नहीं !
रुका जाता नहीं यहाँ,
और कहीं निकल चलो !


उधऱ एक बालक अकेला असहाय,
रोचा सिसकता लगातार ,
कंठ घरघराता ,बीमार ,
 रोते-रोते थक गया सा !
 माँ उधर उत्सव के आंगन के नलके पर
खुशियों के भाँडों में जमी -जली खुरचन को ,
जूठन की पर्तों में जकड़े हुये बर्तन को,
रगड़-रगड़ धोयेगी ,
नहीं उठ पायेगी !
कुछ न कर पायेगी !


बालक ?
अकेला पड़ा रुक-रुक रोयेगा !
भूखा, अकेला ,बीमार ,
कैसे सोयेगा ?
कोई नहीं जो
नेह दृष्टि डाल सहला दे !
बहला दे,
लगा ले आँचल से थपक कर सुला दे !
आते-जाते अपने में मगन लोग,
कोई देखता ही नहीं !


 कोई है , ,
ख़ड़ा यहीं ,सिक्त दृष्टि ले दुलारता ,
नयनों में झाँकता निहारता !
अपने ही आँसुओं को पल्ले से पोंछता
खड़ा यहीं के यहीं !
नैन अभी गीले हैं ,
आँसू बहे आये गाल मेरे हैं !
फिर -फिर पोंछ रहे हाथ यही मेरे हैं !
दृष्टि ने कहा था यही -
' कोख-जाया माँ ,उस जनम का मैं तुम्हारा हूँ!
भूल गईं ?'
फेर नहीं पा रही निगाह
कैसे छोड़ दूँ अकेला असहाय !
लौट जाओ मेरे प्रतिरूप
मेरे बिना कौन उसे देखेगा  ?
हीं ठीक हूँ मैं  !


राग-रंग मुझसे दूर-दूर रह जायेंगे ,
परस नहीं पायेंगे,
कोशिशे बेकार हर बार !
पडे हुये कुण्ठित सुख -बोध सभी,
मेरी गुज़र नहीं कहीं !
डुबा सकी होती मन क्षण भर ही, काश ,कहीं !


मत कहो आने को !
रोने की क्षीण ध्वनि ,
सुख की उल्लास भरी तानो
को चीरती , वहाँ तक चली आयेगी !
कानो से रह-रह टकरायेगी !
मुझे यहीं रहना है!
रोता अकेला उसे छोड़ कहाँ जाऊँगी !
 लौट यहीं आऊँगी !!


दूर , रंग- मंडप की हलचल से
अलग-थलग ,
रहने दो कोशिशे, बेकार !
यहीं ठीक हूँ मैं -
निष्कासित हुई-सी,
निस्संग !