भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कियौ महारास प्रभु बन में / ब्रजभाषा

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:37, 27 नवम्बर 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKLokRachna |रचनाकार=अज्ञात }} {{KKLokGeetBhaashaSoochi |भाषा=ब्रजभाष...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

कियौ महारास प्रभु बन में, वृन्दावन गुल्म लतन में॥
बन की शोभा अति प्यारी, जहाँ फूल रही फुलवारी।
सोलह हजार ब्रजनारी, द्वै द्वै न बीच एक गिरिधारी॥
झ़ड़-ताथे-ताथेई नचत घूँघरू बजत झूम झन झनन।
सारंगी सनन करत तमूना तनन॥

सप्त सुरन सों बजत बाँसुरी, शोर भयौ त्रिभुवन में। वृ.
बंशी को घोर भयौ भारी, मोहे सुन मुनि तप-धारी।
जड़ पशु पक्षी नर-नारी, शिव-समाधि खुल गई तारी॥
झड़ सुन जमुना जल भयौ अचल, सिथिल भये सकल।
जीव बनचारी, मनमोहन बीन बजाय मोहिनी डारी॥
जहाँ के तहाँ थिर रहे परी धुन बंशी की श्रवनन में। वृ.

जब उठ धाये त्रिपुरारी, जमुना कहै रोक अगारी।
गुरु दीक्षा लेओ हमारी, जब करौ रास की त्यारी॥
झड़ नहीं पुरुषकौ अधिकार, सजाशृंगार नारि बनजाओ।
तब महारास के दरशन परसन पाओ।
जमुना के बचन सुने, शिव जान गये सब मन में॥ वृ.

जब खाय भंग कौ गोला, जमुना में धोय लियौ चोला।
गोपी बन गये बंभोला, यों नवल नार अनबोला॥
झड़ जहाँ है रह्यौ रास विलास, पहुंच गये पास, भये अनुरागे
शिव शंकर सखियन संग नाचने लागे।
भूल गये कैलाश वास, हर है रहे मगन लगन में। वृ.

गोपिन संग नृत्य कर्यो है, हिरदे आनन्द भर्यो है।
जब शिव पहिचान पर्यौ है, गोपेश्वर नाम धरयौ है॥
झड़-सब गोपी भई प्रसन्न, धन्य प्रभु धन्य मधुर बीनाकी
कर महारास निशि कीनी छै महीना की।
‘घासीराम’ कृपा सों छीतर बस रह्यौ गोवरधन में॥ वृ.