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कोइ जान रे मरम माधइया केर/ दादू दयाल

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कोइ जान रे मरम माधइया केरौ।
कैसें रहै करै का सजनी प्राण मेरौ॥टेक॥

कौण बिनोद करत री सजनी, कौणनि संग बसेरौ।
संत-साध गति आये उनके करत जु प्रेम घनेरौ॥१॥

कहाँ निवास बास कहँ, सजनी गवन तेरौ।
घट-घट माहैं रहै निरंतर, ये दादू नेरौ॥२॥