भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ख़राब होती न यूँ ख़ाके-शमा-ओ-परवाना / सीमाब अकबराबादी

Kavita Kosh से
चंद्र मौलेश्वर (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:17, 28 जुलाई 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सीमाब अकबराबादी |संग्रह= }} <poem> खराब होती न यूँ ख़...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 

खराब होती न यूँ ख़ाके-शमा-ओ-परवाना।
नहीं कुछ और तो इनसान ही बना करते॥

मिजाज़े-इश्क में होता अगर सलीक़ये-नाज़।
तो आज इसके क़दम पर भी सर झुका करते॥

यह क्या किया कि चले आये मुद्दआ बनकर।
हम आज हौसलये-तर्के-मुद्दआ करते॥

कोई ये शिकवा-सरायाने-ज़ौर[1] से पूछे।
वफ़ा भी हुस्न ही करता तो आप क्या करते?

ग़ज़ल ही कह ली सुनाने को हश्र में ‘सीमाब’।
पडे़-पडे़ यूँ ही तनहा लहद[2] में क्या करते?


शब्दार्थ
  1. अत्याचारों की शिकायत करनेवालों
  2. क़ब्र