भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

खोज-खोज हारे हम / कुमार रवींद्र

Kavita Kosh से
गंगाराम (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:04, 20 नवम्बर 2008 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=कुमार रवींद्र |संग्रह= }} <Poem> खोज-खोज हारे हम ::पता ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

खोज-खोज हारे हम
पता नहीं
कहाँ गई अम्मा की चिट्ठी

अम्मा ने उसमें ही
ख़बर लिखी थी घर की
'टूटी है छत अगले कमरे की
सीढ़ी भी पोखर की

'हुई ब्याह-लायक है
अब तो जानो
बड़के की बिट्टी

'बाबू जी बुढ़ा गए
याद नहीं रहता है कुछ भी
खेत कौन जोते अब
रहता बीमार चतुर्भुज भी

'गाँव के मज़ूर गए
बड़ी सड़क की ख़ातिर
तोड़ रहे गिट्टी'।

बच्चों के लिए हुई
अम्मा की चिट्ठी इतिहास हि
किंतु हमें लगती वह
बचपन की मीठी बू-बास है

चिट्ठी की महक
हमें याद है
जैसे हो सोंधी खेतों की मिट्टी ।