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गए दिनों की याद सा वो फिर कहीं से आ गया / शीन काफ़ निज़ाम

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गए दिनों की याद सा वो फिर कहीं से आ गया
ख़फा-ख़फा सा आया था ख़फा-ख़फा चला गया

बुझा-बुझा मिला मगर चराग़ इक जला गया
गई रुतों का वो मुझे भी आईना दिखा गया

इक आखिरी चराग़ रह गुज़ारे इंतज़ार का
न जाने जी में आई क्या कि उसको बुझा गया

मैं तेरी एक-एक बात याद कर के रो पड़ा
तू एक-एक कर के अपनी बातें भूलता गया

उठाये बोझ उम्र का खड़ा हूँ हांफता हुआ
नगर-नगर में कौन था जो रास्ते बिछा गया

सलीब-ए-सुबह चूमती हैं कसमसाती कोंपलें
चमन के गोशे-गोशे में उदासियाँ उगा गया

रुकी-रुकी सी बारिशों के बोझ से दबीं-दबीं
झुकी-झुकी सी टहनियों को आज फिर हिला गया

उदास-उदास रास्तों पे शाम की ख़मोशियाँ
किसी का हाथ छू गया तिरा ख़याल आ गया