भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे / सीमाब अकबराबादी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सीमाब अकबराबादी |संग्रह= }}Category:गज़ल <poem>ग़म मुझे ...)
 
 
पंक्ति 7: पंक्ति 7:
 
एक दिल देके ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे|
 
एक दिल देके ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे|
 
   
 
   
है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू,  
+
है हुसूल-ए-आरज़ू<ref>इच्छा-पूर्ति </ref> का राज़<ref>रहस्य </ref> तर्क-ए-आरज़ू<ref>इच्छा का त्याग</ref>,  
 
मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे|
 
मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे|
[हुसूल-ए-आरज़ू= इच्छाओं का पूरा होना]
+
 
[तर्क-ए-आरज़ू= इच्छाओं को मारना]
+
  
 
कह के सोया हूँ ये अपने इज़्तराब-ए-शौक़ से,  
 
कह के सोया हूँ ये अपने इज़्तराब-ए-शौक़ से,  
पंक्ति 24: पंक्ति 23:
 
देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे|  
 
देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे|  
 
  </poem>
 
  </poem>
 +
{{KKMeaning}}

09:11, 20 फ़रवरी 2012 के समय का अवतरण

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे|
एक दिल देके ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे|
 
है हुसूल-ए-आरज़ू[1] का राज़[2] तर्क-ए-आरज़ू[3],
मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे|


कह के सोया हूँ ये अपने इज़्तराब-ए-शौक़ से,
जब वो आयेँ क़ब्र पर फ़ौरन जगा देना मुझे|
 
सुबह तक क्या क्या तेरी उम्मीद ने ताने दिये,
आ गया था शाम-ए-ग़म एक नींद का झोंका मुझे|
 
ये नमाज़-ए-इश्क़ है कैसा अदब किसका अदब,
अपने पाय-ए-नमाज़ पर करने दो सज़दा मुझे|
 
देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा,
देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे|
 

शब्दार्थ
  1. इच्छा-पूर्ति
  2. रहस्य
  3. इच्छा का त्याग