भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

गाँव की धूल भरी गलियों से शहर की सड़कों तक / सिराज फ़ैसल ख़ान

Kavita Kosh से
Shrddha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:37, 17 फ़रवरी 2011 का अवतरण (गाँव की धूल भरी गलियोँ से शहर की सड़कोँ तक / सिराज फ़ैसल ख़ान का नाम बदलकर गाँव की धूल भरी गलियों से )

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गाँव की धूल भरी गलियों से शहर की सड़कों तक
ठोकर खाते-खाते आए हैं हम सपनों तक

बात शुरू की ज़िक्र से तेरे, मैख़ाने में पर
चलते-चलते आ पहुँचे हम दिल के ज़ख्मों तक

कितनी रातें जाग के काटीं पूछो तो हमसे
वक़्त लगा कितना आने में उनके होंठों तक

कितना ही मैं ख़ुद को छुपाऊँ कितना ही बहलाऊँ
आँसू आ ही जाते हैं पर मेरी पलकों तक

रोज़ ग़ज़ल का फूल लगा देते ज़ुल्फ़ों में हम
अगर हमारे हाथ पहुँचते उनकी ज़ुल्फ़ों तक