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गाँव बिक रहा है-4 / अमरजीत कौंके

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चन्द सिक्कों के बदले
मेरे गाँव का घर बिक रहा है

जिस घर को
मेरे पूवर्जों ने बसाया
कितनी पीढ़ियों ने उसकी रक्षा की
उसके लिये झगड़े
उस घर को
कितने ख़राब मौसमों से बचाया

जिस घर ने
कितनी बार असहाय परिवारों को
आसरा दिया
रेगिस्तान में तप्ते हुये लोगों को
गाँव के घर में उगे
नीम के वृक्ष ने घनी छाँव दी
चन्द सिक्कों के बदले
वह नीम का पेड़ बिक रहा है

उस गाँव में
कुएँ का मीठा पानी था
जो शहर के प्रदूषित जल से
आज भी कहीं ज़्यादा
शीतल और निर्मल है
पर चन्द सिक्कों के बदले
वह कुआँ बिक रहा है

गाँव नहीं बिक रहा
गाँव के बहाने मेरे पूवर्ज बिक रहे हैं
पूवर्जों के बहाने मेरे संस्कार बिक रहे हैं
इस संसार से विदा हए
मेरे पूवर्जों के परिवार बिक रहे हैं

इस गाँव को
सब से पहले रोटी के बदले
मेरे पिता ने तिलांजिली दी
मेरे भीतर गाँव की
सिर्फ़ याद बाकी रही
मेरे बच्चों ने
वह गाँव कभी देखा भी नहीं
शायद कभी देखेंगे भी नहीं

मेरे गाँव को
सब से पहले
पेट की भूख ने निगला
या मंदहाली के दुख ने खाया
या दिनों-दिन फैलते
महानगरी संस्कृति के वृक्ष की
पड़ गई इस पर काली छाया

इस पल मेरे सामने
मेरा गाँव बिक रहा है

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

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