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"गुनाह का गीत / धर्मवीर भारती" के अवतरणों में अंतर

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बरबाद मेरी ज़िन्दगी
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अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमे
इन फिरोज़ी होठों पर
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अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
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महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
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महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
  
गुलाबी पाँखुरी पर हल्की सुरमई आभा
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तुम्हारा मन अगर सींचूँ
कि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात की दुपहर
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गुलाबी तन अगर सींचूँ तरल मलयज झकोरों से!
इन फिरोज़ी होठों पर
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तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
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कली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचल
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उसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटल
 +
किसी के होठ पर झुक जाएँ कच्चे नैन के बादल
 +
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
 +
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
  
तुम्हारे स्पर्श की बादल-धुली कचनार नरमाई
+
किसी की गोद में सिर धर
तुम्हारे वक्ष की जादू भरी मदहोश गरमाई
+
घटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाए
तुम्हारी चितवनों में नर्गिसों की पाँत शरमाई
+
धड़कते वक्ष पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?
किसी की मोल पर मैं आज अपने को लुटा सकता
+
न हो यह वासना तो ज़िन्दगी की माप कैसे हो?
सिखाने को कहा
+
किसी के रूप का सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?
मुझसे प्रणय के देवताओं ने
+
नसों का रेशमी तूफ़ान मुझ पर शाप कैसे हो?
तुम्हें आदिम गुनाहों का अजब-सा इन्द्रधनुषी स्वाद
+
मेरी ज़िन्दगी बरबाद !
+
  
अन्धेरी रात में खिलते हुए बेले-सरीखा मन
+
किसी की साँस मैं चुन दूँ
मृणालों की मुलायम बाँह ने सीखी नहीं उलझन
+
किसी के होठ पर बुन दूँ अगर अँगूर की पर्तें
सुहागन लाज में लिपटा शरद की धूप जैसा तन
+
प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें
पँखुरियों पर भँवर-सा मन टूटता जाता
+
यहाँ तो हर क़दम पर स्वर्ग की पगडण्डियाँ घूमीं
मुझे तो वासना का
+
अगर मैंने किसी की मदभरी अँगड़ाइयाँ चूमीं
विष हमेशा बन गया अमृत
+
अगर मैंने किसी की साँस की पुरवाइयाँ चूमीं
बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद
+
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
मेरी ज़िन्दगी बरबाद !
+
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
  
गुनाहों से कभी मैली पड़ी बेदाग तरुणाई —
+
'''कविता-संग्रह ’ठण्डा लोहा' से'''
सितारों की जलन से बादलों पर आँच कब आई
+
न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोस कजराई
+
बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पण भी
+
हमेशा आदमी
+
मजबूर होकर लौट आता है
+
जहाँ हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद
+
मेरी ज़िन्दगी बरबाद !
+
 
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20:52, 14 फ़रवरी 2018 का अवतरण

अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सींचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचल
उसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटल
किसी के होठ पर झुक जाएँ कच्चे नैन के बादल
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

किसी की गोद में सिर धर
घटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाए
धड़कते वक्ष पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?
न हो यह वासना तो ज़िन्दगी की माप कैसे हो?
किसी के रूप का सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?
नसों का रेशमी तूफ़ान मुझ पर शाप कैसे हो?

किसी की साँस मैं चुन दूँ
किसी के होठ पर बुन दूँ अगर अँगूर की पर्तें
प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें
यहाँ तो हर क़दम पर स्वर्ग की पगडण्डियाँ घूमीं
अगर मैंने किसी की मदभरी अँगड़ाइयाँ चूमीं
अगर मैंने किसी की साँस की पुरवाइयाँ चूमीं
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

कविता-संग्रह ’ठण्डा लोहा' से