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घर से निकता तो मुलाक़ात हुई पानी से / सरवत हुसैन

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घर से निकता तो मुलाक़ात हुई पानी से
कहाँ मिलती है ख़ुशी इतनी फ़रावानी से

ख़ुश-लिबासी है बड़ी चीज़ मगर क्या कीजिए
काम इस पल है तिरे जिस्म की उर्यानी से

सामने और ही दीवार ओ शजर पाता हूँ
जाग उठता हूँ अगर ख़्वाब-जहाँबानी से

उम्र का कोह-ए-गिराँ और शब-ओ-रोज़ मिरे
ये वो पत्थर है जो कटता नहीं आसानी से

शाम थी और शफ़क़ फूट रही थी ‘सरवत’
एक रक़्क़ासा की जलती हुई पेशानी से