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चंद रुबाइयात / अमजद हैदराबादी

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हर ज़र्रेपै फ़ज़ले-किब्रिया[1] होता है।

इक चश्मे-ज़दन में[2] क्या से क्या होता है॥

असनाम दबी ज़बाँ से यह कहते हैं--

"वो चाहे तो पत्थर भी खु़दा होता है॥


हर गाम पै चकरा के गिरा जाता हूँ।

नक़्शे-कफ़े-पा बनके मिटा जाता हूँ॥

तू भी तो सम्भाल मेरे देनेवाले!

मैं बारे-अमानत में दबा जाता हूँ॥


इस जिस्म की केचुली में इक नाग भी है।

आवाज़-शिकस्ता दिल में इक राग भी है॥

बेकार नहीं बना है, इक तिनका भी।

खामोश दियासलाई में इक आग भी है॥



शब्दार्थ
  1. ईश्वरीय कृपा
  2. पलक मारते