भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चलु चलु मन मोरा, सतगुरु धाम रे / रामेश्वरदास

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 04:45, 21 अक्टूबर 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रामेश्वरदास |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKC...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चलु चलु मन मोरा, सतगुरु धाम रे।
छुटी जावे आवागमन के काम रे॥1॥
चोरी जारी नशाँ हिंसा, झूठ बतियान रे।
छोड़ि देहो पंच पाप, नरक निशान रे॥2॥
सत संग गुरु सेवा, भजन-ध्यान रे।
करि लेहो नित प्रति, होइवे कल्यान रे॥3॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु सदा शीव रे।
गुरु हीं शब्द ब्रह्म, पार ब्रह्म पीव रे॥4॥
‘रामदास’ जपो गुरु, मंत्र धरो धियान रे।
नरतन कब छूटै, कोइ न ठिकान रे॥5॥