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चेहरे देखते हैं तख्तियाँ देखते हैं / सुदेश कुमार मेहर

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चेहरे देखते हैं तख्तियाँ देखते हैं
लोग बिकने से पहले बोलियाँ देखते हैं

इक मुहब्बत भरा सैलाब मुझ में भी तो है,
बाप हूँ इसलिए सब सख्तियाँ देखते हैं

सब्सिडी की उन्हें है क्या खबर आज भी जो,
सिगडियां देखते हैं चिमनियाँ देखते हैं

हम दिये से जला लेंगे दिये और भी कई,
आप क्यूँ माचिसों में तीलियाँ देखते हैं

मंजिलें भी हमारी, ये सफ़र भी हमारा,
हम कहाँ रास्तों की मर्जियां देखते हैं

हर कोई ख्वाब की तामीर बस सोचता है,
कौन हैं जो कटी हुई उँगलियाँ देखते हैं

है हुनर बदजुबानी का हमें भी नहीं कम,
हम बुजुर्गों की लेकिन पगड़ियाँ देखते हैं

वो भला कब मनाने से रुका है किसी के,
रास्ता काट दें जो बिल्लियाँ देखते हैं