भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चौकीदार / हरीश करमचंदाणी

Kavita Kosh से
Neeraj Daiya (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:21, 26 मई 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: <poem>अँधेरे और सन्नाटे को चीरती गूंजती हैं आवाज़ जागते रहो यह आवा…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अँधेरे और सन्नाटे को चीरती
गूंजती हैं आवाज़
जागते रहो
यह आवाज़ सिर्फ वे सुनते हैं
जो जाग रहे होते हैं
सोये हुए लोग सोये ही रहते हैं
सोचता हूँ
सोये हुओं को
जगाने को
जो कहे
वह आदमी कब आएगा