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जब भी मैं जिन्दा होती हूँ / स्वाति मेलकानी

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कभी कभी,
जब भी मैं जिन्दा होती हूँ
आसपास में जो कुछ भी दिखने लगता है
बदसूरत सा हो जाता है।
इसके सड़ने
और गलने की
बदबू से
मेरा दम घुटने लगता है।
मेरी आँखें, कान, होंठ
सब जाने क्या करने लगते हैं
विद्रोही से हो जाते हैं
मेरा साथ छोड़ देते हैं
शायद मैं मरने लगती हूँ।
मरने में भी कैसा सुख है
मेरी आँखें, कान, होंठ
सब अपने से मतलब रखते हैं
बेवजह नहीं खुलते
और ज्यादातर बन्द रहते हैं
मेरे आसपास का सबकुछ
फिर अच्छा लगने लगता है।
जो है
जैसा भी है
पर मुझको मरने में आसानी है
खुद को कई बार परखा है
मैं मरने में खुश रहती हूँ
जाने क्यों
मैं कभी-कभी जिन्दा होती हूँ।