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"ज़ुल्म की ज़माने में ज़िन्दगी है पल दो पल / शाहिद मिर्ज़ा शाहिद" के अवतरणों में अंतर

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कह रहा था तन्हाई काटती है पल दो पल
 
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दिल करार पाता है, आखरत संवरती है
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दिल करार पाता है, आखरत सँवरती है
 
रहमतें मुसलसल हैं, बंदगी है पल दो पल
 
रहमतें मुसलसल हैं, बंदगी है पल दो पल
 
   
 
   
वक्त का तकाज़ा है अहतियात लाजिम है
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खुदगरज़ ज़माना है दोस्ती है पल दो पल
 
खुदगरज़ ज़माना है दोस्ती है पल दो पल
 
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22:10, 7 नवम्बर 2010 के समय का अवतरण


ज़ुल्म की ज़माने में ज़िन्दगी है पल दो पल
ये है नाव कागज़ की, तैरती है पल दो पल
 
ये भी हादसा आख़िर, लोग भूल जाएँगें
कंकरी से पानी में, खलबली है पल दो पल
 
मैं भी जाने वाले का, ऐतबार कर बैठा
कह रहा था तन्हाई काटती है पल दो पल
 
दिल करार पाता है, आखरत सँवरती है
रहमतें मुसलसल हैं, बंदगी है पल दो पल
 
वक़्त का तकाज़ा है अहतियात लाजिम है
खुदगरज़ ज़माना है दोस्ती है पल दो पल