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जोशे-जुनूं में आबला पाई है ज़िन्दगी / 'हफ़ीज़' बनारसी

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जोशे-जुनूं में आबला पाई है ज़िन्दगी
अहले-खिरद के हाथ कब आई है ज़िन्दगी

दौड़े है काटने के लिए अपना साया भी
किस दश्ते-बेपनाह में लाई है ज़िन्दगी

जीना पड़ेगा औरों की खातिर हमें यहाँ
अपनी नहीं है यारो पराई है ज़िन्दगी

कुछ इम्बिसाते-वस्ल भी कह लीजिये, मगर
सच पूछिये तो दर्दे-जुदाई है ज़िन्दगी

तब उनकी बज़्मे-नाज़ के क़ाबिल हुए हैं हम
बरसों बरंगे-शमअ जलाई है ज़िन्दगी

शर्म आ रही है काबे को जाते हुए 'हफ़ीज़'
हमने सनमकदों में गंवाई है ज़िन्दगी