Last modified on 7 नवम्बर 2010, at 22:44

जो ग़ज़लें मंसूब हैं तुमसे उनको फिर दोहराना है / शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

जो ग़ज़लें मंसूब हैं तुमसे उनको फिर दोहराना है
रूठे हुए गीतों की ख़ातिर तुमको लौट के आना है

माज़ी के वरकों में यादें सपनों जैसी लगती हैं
नज़्में अपनी तुम बिन भीगी पलकों जैसी लगती हैं
डूबे हुए हैं ग़म में तराने घायल हर दोगाना है
रूठे हुए गीतों की ख़ातिर तुमको लौट के आना है

हँसते हुए चेहरों के पीछे दर्द की एक कहानी है
ऐसा लगता है शबनम भी गुल की आँख का पानी है
चेहरों का इक शहर है लेकिन तुम बिन सब वीराना है
रूठे हुए गीतों की ख़ातिर तुमको लौट के आना है

प्यार का आँगन छूट रहा है कैसी किस्मत पाई है
अपना मिल पाना मुश्किल है, तल्ख़ है, पर सच्चाई है
मैं तो 'शाहिद' मान गया हूं, दिल को भी समझाना है
रूठे हुए गीतों की ख़ातिर तुमको लौट के आना है