झुके हुए दरख्तों के पार / इला कुमार - Kavita Kosh
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झुके हुए दरख़्तों के पार झाँकती है एक किरण
बुझी-सी अनमनी-सी
पुरते सपनों के हर रंग को
डुबो-डुबो जाता है गाढ़ा अंधेरा

अनिश्चित को चाहते हुए असमंजस की दीवारों से घिर जाती हूँ
तो
पर्त-सी खुलती है
कि
चांद तो दूर कहीं दूर
आंधियों के पार घिर, जा चुका

रेतीले चक्रवातों के बीच
डगमगाती खड़ी हूँ
किसी नए क्षितिज कि तलाश में