भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

टूटी चंपा कलिया चुनेगा मियाँ बँदरा लाल / मगही

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:26, 28 जुलाई 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKLokRachna |भाषा=मगही |रचनाकार=अज्ञात |संग्रह= }} {{KKCatMagahiR...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

टूटी चंपा कलिया चुनेगा मियाँ बँदरा[1] लाल।
टीका मैला हो रे मोतिया न मैली हो लाल।
टूटी चंपा कलिया, चुनेगा मियाँ बँदरा लाल॥1॥
बेसर मैला हो रे, चुनिया[2] न मैली हो लाल।
टूटी चंपा कलिया, चुनेगा मियाँ बँदरा लाल॥2॥
बाली मैली हो रे, झुमका न मैला हो लाल।
टूटी चंपा कलिया, चुनेगा मियाँ बँदरा लाल॥3॥
सूहा[3] मैला हो रे, छापा न मैला हो लाल।
टूटी चंपा कलिया, चुनेगा मियाँ बँदरा लाल॥4॥

शब्दार्थ
  1. प्यारे दुलहा
  2. छोटा नग
  3. विशेष प्रकार की छापे वाली लाल रंग की साड़ी